माँ

लौट के जब शाम को, माँ घर पे आती है,
आँचल में वो अपने, दुनिया समेट लाती है।

चेहरे पे कभी शिकन उसके, देखी नहीं मैंने,
कोई हाल जो पूछे तो, वो अच्छा बताती है।

बड़ा हो गया हूँ मैं, मगर वो मानती है नहीं,
वो पहला कौर अपने, हाथों से खिलाती है।

एक बात जो उसकी, अब तक नहीं बदली,
बचपन के नाम से ही, वो मुझको बुलाती है।

सबकी तकलीफ़ों का, अन्दाज़ा है उसको,
लेकिन वो अपना दर्द, सभी से छिपाती है।

मुझे घर में आज तक, यह पता नहीं चला,
कहाँ पे बैठ तन्हाई में, वो आँसू बहाती है।

उसके वास्ते कभी, नया लेने की बात की,
वो हर बार कुछ नए ही बहाने बनाती है।

तूफान हो या कोई, जलज़ला हो ‘समन्दर’,
माँ सामने आकर के, सारा घर बचाती है।

-गोपेश दशोरा ‘समन्दर’
उदयपुर (राजस्थान)

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee