निवाले अपनी थाली के खिलाना जानती है माँ
सभी रोते हुए बच्चे हँसाना जानती है माँ
तेरी ऊँची उड़ानों को मिले हैं पर इसी दम से
पिता के बाद भी रोटी कमाना जानती है माँ
तेरे मासूम बचपन को जरूरत का मिले सामाँ
बदन ईटों के भट्टे पर जलाना जानती है माँ
हमेशा हाथ में खंज़र लिए घर से निकलती है
ज़माने की निगाहों का निशाना जानती है माँ
तभी तो आसमाँ कदमों में अब तक सर झुकाता है
जमीं पर चाँद तारों को उगाना जानती है माँ
-दिनकर राव दिनकर
