मातृ दिवस पर दुनिया की हर माँ को प्रणाम

आज सब मदर्स डे मना रहे हैं वैसे तो ये विदेशी सिस्टम है क्योंकि हमारे यहाँ तो बच्चे माता पिता से दूर ही कहाँ होते हैं जो दिवस मनाना पड़े पर अच्छा ही है इस बहाने माता पिता की बातें ही कर लेते हैं उन्हें स्पेशल फ़ील करा देते हैं । आज मैं अपने भीतर वर्षों से छुपाये अहसास बयां कर रही हूँ, हो सकता है कुछ लोग मुझे गलत माने पर अब लोग क्या सोचते हैं इस बात से फरक पड़ना बंद हो चुका है क्योंकि जिसके जितनी बुद्धि होगी वो वही सोचेगा ।
बचपन मैं और मेरे बड़े भैया तो दादी बाबा के पास ही रहे। मैं तो दादी को ही मम्मी कहती थी बहुत बाद में पता लगा कि जिन्हें मैं भाभी कहती हूँ वो असल में मम्मी हैं । मैं ढाई वर्ष की थी तब मेरे जुड़वा भाई हुए और बाद में माँ, पापाजी के साथ पोस्टिंग पर चली गई । हम दोनों बहन भाई का ख्याल दादी बाबा ने ही रखा ,बुआ चाचा ही हमारे भाई बहन थे । माँ साथ भी रही तो भी वैसा जुड़ाव नहीं हुआ जो एक माँ बेटी में होता है क्योंकि मेरी माँ कभी मेरी दोस्त बन ही नहीं पाई । संस्कार के पाठ तो पढ़ाती रही पर बेटी को प्यार के साथ उस भरोसे की जरूरत भी होती है जहां बेटी खुलकर अपनी माँ को हर बात बता सके ,ये उनको कभी समझ ही नहीं आया । वे अपनी बेटी को परफेक्ट बनाने में जुटी रही सिलाई ,कढ़ाई ,कुकिंग, अचार, पापड़ बनाना और सहनशील बनना सिखाने में वे इतनी मशगूल हुई कि बेटी को और भी कुछ चाहिए ये याद ही नहीं रहा । पापाजी अक्सर कहते थे कि तुम्हारी माँ तुम्हें ननद देवर समझती है बेटा बेटी नहीं तो हम खूब हँसते ।
हमारे लाड़ तो दादी बाबा ने ही किए एक लड़की की माँ के सिखाने की बातें और पाठ होते हैं वो मेरी दादी और चाची ने सिखाए ।टीन एज में ही थी तभी छोटे चाचा की शादी हुई और चाची या गई वैसे तो दो चाची हैं पर बड़ी चाची कम ही रही और उनके अंदर बड़प्पन का अभाव हमेशा रहा लेकिन उनके विपरीत छोटी चाची बहुत ही सुलझी हुई और समझदार थी मैं उनके करीब होने लगी क्योंकि मेरे भीतर के शारीरिक बदलाब हों या कोई भी ऐसी बात जो एक लड़की को पता होनी चाहिए हर बात चाची और दादी ने समझाई हर ऊंच नीच सिखाना, रिश्तों की अहमियत ,ससुराल में किस तरह रहना है, पति के साथ या बच्चों के साथ किस तरह जुड़ना है, कैसे सबका ख्याल रखना है ये भी चाची दादी सिखाती रही । मेरी उपलब्धि पर खुश होना मेरे दुख को बिना कहे समझना, मेरे भीतर उठने वाले हर प्रश्न का जबाव दादी के पास था ।
बच्चे हुए तब भी दादी और माँ पास थी लेकिन मुझे दादी ही सब समझाती रही । ऐसा नहीं है कि माँ ने प्यार नहीं दिया या मैं अपनी माँ को प्यार नहीं करती पर जब आसपास माँ बेटी के रिश्ते देखती तो मैं मिस करती थी सोचती थी मेरी माँ ऐसी क्यों नहीं जिनसे मैं हर बात शेयर कर पाऊँ ? बेटी बिगड़ न जाए शायद इस डर ने उन्हें मेरे प्रति कठोर बना दिया । कितनी सारी बातें थी जो माँ को बताना चाहती थी पर डर के मारे कभी बोल ही नहीं पाई, झेलती रही बहुत सी गलत बातें भी । शायद इसलिए ही पुस्तकों से और कलम से नाता जोड़ लिया जो अभी तक मेरे साथ हैं ।
कोई भी कुछ बोल दे मेरे बारे में तो आज भी मेरी माँ राशन पानी लेकर चढ़ जाती है, बिना मेरा पक्ष जाने । पहले तो मैं समझाने का प्रयास करती थी कि मुझे भी तो सुनो, मैंने वो काम किया है या नहीं पर अब मैंने उम्मीद ही छोड़ दी है कि वो बदलेंगी, इसलिए चुप्पी साध ली है खुद को साबित करना छोड़ दिया है मान लिया जैसी भी हैं माँ है वो जैसे खुश रहना चाहें रहें उनकी खुशी मेरे लिए सर्वोपरि है ।
मैं दादी के पास ही ज्यादा रही इसलिए उनके गुण खूब सीखे जैसे घरेलू नुस्खे और घरेलू इलाज , दादी भगवान , की कथाएं सुनाती भक्तों की कथा सुनाती, मुझे अध्यात्म से जोड़ने का काम दादी ने ही किया ।बचपन में उनके साथ ही द्वारिकधीश दर्शन को जाती ,परिक्रमा करती और भागवत भी सुनी। जीवन के बहुत से ऐसे पाठ सीखे जो आज के माहौल में ज्यादा प्रासंगिक लगते हैं । दादी और माँ का रिश्ता सास बहु जैसा नहीं माँ बेटी जैसा था, दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करती , एकदूसरे का ख्याल रखती थी , शायद उन्हें देखा था इसलिए ही मैं अपनी बहुओं से अच्छा तालमेल बना पाई हूँ । और चाची को मेरी माँ छोटी बहन जैसा प्यार करती थी अपनों के साथ किस तरह स्नेह और सामंजस्य बनाना है ये माँ को ही देखकर सीखा ।
जब मैं दादी बनी तो दादी बहुत खुश हुई कोविड टाईम था इसलिए मिल नहीं पाई वे त्रिशा से, लेकिन वीडियो काल पर देखकर बोली -मेरी गुड्डो दादी बन गई ‘ उनकी आँखों की वो चमक आज भी मेरी आँखों से दूर नहीं हुई । उनकी खुशी देखने वाली थी । पापाजी का जाना उन्हें तोड़ गया था बहुत रोती थी । दादी को गए चार वर्ष हो जाएंगे लेकिन उनकी यादें उनकी सीख आज भी मेरे साथ हैं । मेरी दादी माँ- मेरी जीजी को प्रणाम जिन्होंने मुझे बिखरने नहीं दिया, भटकने नहीं दिया और टूटने नहीं दिया सदा मेरे साथ खड़ी रहीं और आज भी हैं ।
मेरे जीवन में आई उन सभी माओं –( सासु माँ ,चाची ,मामी ,बुआ, मौसी , भाभी ) को प्रणाम जिनसे हमेशा कुछ न कुछ सीख जरूर मिली
नोट – बच्चे को परफेक्ट बनाने के चक्कर में माँ होना पीछे नहीं छूटना चाहिए क्योंकि माँ ही एक बच्चे की पूरी दुनिया होती है .

-अर्चना चतुर्वेदी

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