तेज़ हवा थी और छप्पर था,
मौसम कितना हमलावर था।
मिट्टी के अहसास थे अपने,
दरियाओं के आगे घर था।
सर पर गठरी आसमान की,
झोली में अपने अम्बर था।
डूब के मरना था क़िस्मत में,
और पानी भी चुल्लू भर था।
शीशों के घर काँप रहे थे,
सबके हाथों में पत्थर था।
चीख़ रहे थे प्रश्न यक्ष के
ख़ामोशी में हर उत्तर था।
नींद आख़री जब आई थी,
शोलों पर अपना बिस्तर था।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
