मिट्टी स्वर्ण समान

“सोना – कनक – स्वर्ण”

जीवन है अनमोल,समय को कभी न खोना।
पल – पल हो उपयोग,जाग कर्मण मत सोना।।

भू – गर्भा भंडार, निकलते हीरे मोती।
मिट्टी स्वर्ण समान, दीप्त धरती पर होती।।

शुभ – सोलह शृंगार,स्वर्ण आभूषित नारी।
दमके कंचन रत्न, रूप अद्भुत बलिहारी।।

भूषण स्वर्ण विचार,धार शुचि मंगलकारी।।
महँगाई की मार,लाख – दो कीमत भारी।।

कनक -कनक में फर्क, एक मादक जहरीला ।
दूजा होता धातु, पहन नथ – कंगन पीला।।

कनक लता से कर्ण, सजे भूषण अति सुंदर।
खिले कनक के पुष्प,शोभते शिव के सिर पर।।

कंचन स्वर्ण विचार, चित्त चिंतन से चमके।
कहते सोनाखान, वीर का मस्तक दमके।।

सोना – सोना स्वप्न, मूल्य बाजार बढ़ाए।
समझें मोदी मंत्र, दाम खुद ही घट जाए।।

सोना उगले खेत, कृषक श्रम दिनभर करता।
हीरे – मोती अन्न, उदर सबके है भरता।।

कंचन – कुंदन स्वर्ण, कनक बेटी है सोना।
दो कुल की है लाज, बचा लें गर्भ न खोना।।

कनक कामिनी केश, जड़े मोती के गहने।
रजत पैंजनी धार,पधारी लक्ष्मी रहने।।

सोना महँगा आज, तिजोरी होती खाली।
बढ़ा स्वर्ण – व्यापार,हाल खस्ता है माली।।

सोना पुत्र महान, कनक कंचन है वीरा।
अमर मातु का लाल, प्राण – प्रण जय रणधीरा।।

-अमिता रवि दुबे
छत्तीसगढ़

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee