बोलो क्या बोलना है?
एक औपचारिक सा सवाल पूछा था तुमने,
कैसे बोलें क्या बोलें?
बहुत सी बातें हैं मन में
शुरुआत कहां से करें,
एक तस्वीर जो कभी बनाई थी,
मनपसंद रंगों से सजाई थी,
तुम्हें वे रंग पसंद नहीं थे,
धीरे-धीरे तस्वीर मेरी रही,
और रंग तुम्हारी पसंद के,
उम्र के साथ दुनियादारी समझ आने लगी,
पर मन पर बोझ बढ़ने लगा,
कटे-फटे घिसे-पिटे रिश्तों में खांफे पड़ने लगीं,
कुछ कुछ अवसरों पर जो तुरपाई की थी वो भी उधड़ने लगी,
उम्र भर निभाई जिम्मेदारी अब आदत बन चुकी है,
कभी प्रेम से जो खींचीं थी तस्वीरें
अब मुंह चिढ़ातीं हैं,
सिर्फ एक बार इस आवरण से बाहर आ कर मुझसे बात करो,
औपचारिकता में नहीं
सच में पूछो,
सुनों वो दर्द जो एक उम्र से मेरा साथी है,
मेरे अकेलेपन का सहारा हैं,
और शायद मेरे जीने की वजह भी है
-नमिता दुबे मिशा
