अरे! मुसाफिर तू कहां जाएगा?
कुछ तो पाया नहीं, क्या खोएगा?
तेरा कौन है? न यहां, न वहां,
तू जाएगा कहां?
निकला था बहुत दिनों पहले,
पीछे छोड़ के सारे झमेले,
अब कहां जाएगा?
क्या खोया था, और क्या पाएगा?
रुक के देख थोड़ी देर,
रुक के उनकी तरफ मुंह तो फेर,
नहीं देखेंगे वह लोग तुझे अगर , तो चले जाना,
घने कोहरे में कही खो जाना।
सब छूट रहा है पीछे,
थोड़ा तो देख ऊपर, थोड़ा तो देख नीचे,
तेरे जाने के बाद अगर वह रोएंगे तो क्या करेगा?
अरे! मुसाफिर कैसे अपना पेट भरेगा?
अरे! मुसाफिर यहां तेरा कोई नहीं अपना,
सब कुछ केवल है एक सपना,
तू चला जाएगा तो सपना टूट जाएगा,
तू क्या पियेगा? और क्या खायेगा?
अरे! मुसाफिर तू कहां तक जाएगा?
क्या पाएगा? और क्या खायेगा?
जब कुछ न है तेरा,
कुछ न है मेरा।
-प्रणव राज,
कैमूर (बिहार)

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Badhiya