वो यादें वो बचपन
वो खुशियांँ वो उपवन
कहांँ खो गया
न पता अब सजन
धूल मिट्टी में हरदम
लिपटे थे मगन
न घर की फ़िक्र थी
न ख़ुद की जतन
क्या लिखूंँ इस से ज्यादा
न लगता है दिल
न कलम में है स्याही
न करता है मन
अब तू ही बता दे
बता दे सजन
कहाँ खो गया वो
मेरा बचपन
-अमित प्रेमशंकर
