मैंने ,एक मज़बूत पेड़ सेबाँध दिए हैं अपनेसारे दुख ….
और सींचती हूँहर रोज़ उसे …
जानती हूँ किपेड़ रहेगा जब तकहरा-भरा …….
मेरे दुखों के चेहरे भीकभी नहीं मुरझाएँगे।
– चित्रा सिंह
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