मेरे प्रिय मन….

मेरे प्रिय मन,

आज बहुत दिनों बाद तुझसे बात करने बैठा हूँ। भीतर तक झाँकने की हिम्मत जुटा पाया हूँ।

बचपन कितना सुनहरा था? माँ की लोरी, पिता का कंधा, गाँव की गलियाँ। फिर कम उम्र में ही ब्याह हो गया। जिम्मेदारियों ने कंधे झुका दिए, पर तूने हार नहीं मानी।

28 साल का सफर… साथी के संग हँसी-खुशी, संघर्ष-सफलता सब देखा। सोचा था बुढ़ापा साथ काटेंगे। पर वो बीच राह में ही हाथ छुड़ाकर चली गई। तू पूछता है न रोज- “अब मैं किसके लिए जीऊँ?”

आज भी मन, तुझ पर बोझ कम नहीं। एक तरफ गाँव का वो पुश्तैनी मकान और खेत जो बूढ़े माँ-बाप की आँखों में उम्मीद बनकर चमकते हैं। दूसरी तरफ मुंबई में अपने एक आशियाने की तलाश,यह सपना अभी जिंदा है।

बेटियाँ बड़ी हो रही हैं। उनकी पढ़ाई, उनकी शादी, उनका भविष्य- हर रात तुझे सोने नहीं देता। सोचता है न कि “कल को मैं न रहा तो इनका क्या होगा?”

बुढ़ापे का डर भी सताता है। शरीर साथ छोड़ने लगा है, पर मन कहता है – “किसी पर बोझ नहीं बनना।” न बेटियों पर, न समाज पर। स्वाभिमान से जीना है।

पर सुन मेरे मन, तू अकेला नहीं है। जिसने बचपन दिया, जवानी दी, उसने बुढ़ापा भी सोच रखा होगा। जब 28 साल का साथ देकर उसने एक अध्याय खत्म किया, तो नया अध्याय भी वही लिखेगा।

तू बस इतना कर- चिंता छोड़ और कर्म कर। मुंबई में वो छत भी मिलेगी। बेटियों को पंख दे। माँ-बाप की सेवा कर। और जब अंतिम समय आए, तो प्रभु के चरणों में सिर रखकर कह देना- “तेरी रजा में राजी हूँ।”

आज से वादा कर मन, रोएगा कम, मुस्कुराएगा ज्यादा। क्योंकि आँसू पीने से बेहतर है, उन्हें हौसला बनाकर आगे बढ़ जाना।

तेरा ही,

-आनंद पाण्डेय “केवल”
(“एक टूटा हुआ,पर फिर से जुड़ता हुआ इंसान”)

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