मेरे मन,

मेरे मन,
मैं तुमसे बहुत कम बात करती हूँ,जबकि तुमसे अच्छा और हमेशा साथ रहने वाला और मुझे अचछे से समझने वाला दोस्त कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, फिर भी मैं तुम्हारे लिए समय नहीं निकाल पाती क्या करूं? सांसारिक मोह में इतना घुल मिल गई हूँ, कि तुम्हारा ध्यान सिर्फ तब आता है,जब आसपास कोई बोलने बताने वाला नहीं होता और तुम फिर अचानक याद आते हो,तुम्हें तो पता है कितनी चपल, चंचल थी मैं पहले,लेकिन उम्र के साथ जिम्मेदार भी बनना होता है, जीवन के सभी रिश्ते महत्वपूर्ण हैं, और तुम तो मेरे सबसे निकटतम हो, लेकिन सबसे ज्यादा समझदार भी, तो तुम तो मेरी मजबूरियों को समझते ही हो, बस इसीलिए हमारी बात ही नहीं हो पाती ज्यादा,जबकि तुमसे अच्छा मुझे कोई नहीं समझ सकता, क्योंकि तुम पूर मनोयोग से मुझे सुनते हो, समझते हो, फिर सोच विचार कर अपने तर्क प्रस्तुत करते हो कभी मैं गलत हूँ या कभी गलत करने वाली होती हूँ तो तुम आगाह कर देते हो, अन्य मित्रों की भाँति मेरी हाँ में हाँ नहीं मिलाने लगते,मेरा विश्वास तुम पर और गहरा हो जाता है,कभी कभी मुझसे भी गल्तियाँ हो जातीं हैं लेकिन तुम मुझे हौंसला देकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हो,और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की शक्ति देते हो,
तुम्हारे बता ए रास्ते पर चलकर फिर चल पड़ती हूँ,अपने मानव जन्म को सार्थक करने, तुम कभी मुझे भटकने ही नहीं देते अगर मैं भटकना भी चाहूँ तो मेरा हाथ पकड़कर मुझे बचा लेते हो,
तो मेरे मन तुम्हारा कम समय का स्वयं को दिया ज्ञान मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाता है, भले ही तुमसे मेरी बातें कम होतीं हैं, लेकिन जब जब तुमसे मिलती हूं,बहुत समय के अधूरे पड़े ज्ञान को तुम पूर्ण कर देते हो,और मैं तुम्हारे बता ए रास्ते पर चल पड़ती हूँ, आज तुम से मिलकर बहुत से मन के बोझ हल्के हुए हैं, और मैं फिर चल पड़ी हूं, अपने कर्तव्यों की ओर!
आज तुमसे मिल बहुत बहुत अच्छा लगा, जल्द ही मिलने की आकांक्षा लिए अब मैं तुम से विदा लेती हूँ, धन्यवाद मेरे मन, मुझे सिर्फ तुमसे ही उम्मीद है,मेरा साथ कभी मत छोड़ना।

तुम्हारी ही अपनी

किरण मोर
कटनी (म.प्र.)

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