रिश्तों की चतुराई से डर जाता हूँ
भाई हो कर भाई से डर जाता हूँ
जाने कैसा-कैसा सच दिखलाती है
आँखों की बीनाई से डर जाता हूँ
ऊपर जाना सिर्फ़ अकेला होना है
शुह्रत की ऊँचाई से डर जाता हूँ
भूल चुका हूँ माज़ी की हर चोट, मगर
इस बहती पुरवाई से डर जाता हूँ
मुझको मेरे पास अकेला मत छोड़ो
मैं अपनी तनहाई से डर जाता हूँ
-त्रिवेणी पाठक
