‘मैं’ का रोग

मैं’ का रोग जिस जिस को लगा,
उस पर न दवा, न ही कोई टोटका लगा।

अपने अभिमान से न जाने इसने‌ कितनों को ठगा।
वह नहीं रहा अब किसी का भी सगा।
‘मैं ‘का रोग जिस जिस को भी लगा,..

सुख-चैन-शांति सब यह ले भगा।
रिश्तों को ताक पर रख, दे रहा सबको दगा ।
‘मैं’ का रोग जिस-जिस को लगा,..
उस पर‌ न दवा, न ही कोई टोटका लगा।

-डॉ संगीता बिंदल

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