चौराहे पर खड़ा अपना वजूद ढूंढता हूं।
मैं मजदूर हूँ, पर मजबूर नहीं।
श्वेद में नहाकर अन्न देता हूँ।
खूद भूखे-प्यासे गुजर करता हूँ।
दूसरे के हंसते चेहरे देखता हूं।
स्वयं झोपड़ी में रहकर भी खुश रहता हूं।
औरों के लिए सुंदर महल बनाता हूं।
मैं मजदूर हूं पर मजबूर नहीं।
सबको खुश देख खुश रहता हूं।
मेरे जीवन में त्याग और तप है।
पसीने की कमाई सीमित साधन है।
देता सुकून खाते सूखी रोटियां।
जमीन ही होता मखमली बिछौना।
सुबह निकल काम तलाशते।
चौराहों पर खड़े नज़र आते।
-प्रेम सिंह “काव्या”
छत्तीसगढ़
