“मैं माँ हूँ “
कोई कहता माँ, जननी, आयी, अम्मा,जन्मदायिनी माता, अंबा,
मैया, माँ, महतारी, जन्मदात्री, वालिदा
नाम कोई भी हो पर माँ तो होती
बस माँ
देती जन्म ,पाला पोसा कर
करती बड़ा
खुद गीले में सोती रही
बच्चे को सूखे में सुलाती
उंगली पकड़ चलना सिखाती
बोलना, लिखना, पढ़ना
हर चीज़, हर ज़रूरत का खुद से
पहले रखती ख्याल
पग पग बन साहस, संबल,
हिम्मत, हौंसला चलती साथ सदा
होती पहचान, जीवन, ये साँसें, धड़कन
शब्द, एहसास कम पढ़ जाएं
करने को बयां
“मैं माँ हूँ ” जो बस होती माँ
समर्पण, त्याग, निश्छल प्रेम की मूरत
बिना किसी भेदभाव या लोभ लुटाती
प्यार बच्चों पर
उनकी खुशी में होती खुश
दुःख में दुखी
बाहर से दिखती कठोर पर
कोमल अंदर से
कभी न मिलता वक्त खुद के लिए
सोचने, चाहने का
बस बच्चों को ही रहता
पूरा जीवन समर्पित
“मैं माँ हूँ ” नहीं मांगती घर,
बंगले, गाड़ी, सोना, चांदी, पैसा,
ऐशोआराम बस दो बोल प्यार के,
सम्मान के
और साथ जब ढलने लगे उम्र मेरी।।
-मीनाक्षी सुकुमारन
नोएडा
