हां मैं अटल खड़ा हूं ;
एक वंश वृक्ष के जैसे।।
आंधी, पानी, गर्मी जैसी,
लाख मुसीबत आए,
फिर भी मैं अटल खड़ा हूं,
एक वंश वृक्ष जैसे।।
प्रकृति की खूबसूरती को,
खड़ा हूं अपने में समेटे,
लाख तूफानों को झेल,
खड़ा हूं पर्वत के जैसे।।
हां मैं अटल खड़ा हूं,
एक वंश वृक्ष जैसे।।
-साधना छिरोल्या
दमोह (मध्य प्रदेश)
