किसी अपने की मौत का दर्द,
और उन परिस्थितियों में जो महसूस होता है वह इस ग़ज़ल में देखिए।
नहीं लौट पाते कभी जाने वाले,
भले कोई कितने ही आँसू बहा ले।
सभी फर्ज़ हैं अब मेरे ही हवाले,
कहूं कैसे मौला कि मुझको उठा ले।
निभे जिस तरह भी तू वैसे निभा ले,
ये दिल ने कहा बच सके जो बचा ले।
यहां सब ही सदमे में आते नज़र हैं,
किसी के भी मुंह तक न जाते निवाले।
खड़े हैं जो मंजिल पे देखा सभी ने,
कहां देख पाए वो पांव के छाले ।
इन अपनों को अपना कहूँ किस तरह मैं
भुला सब ही एहसान इल्ज़ाम डाले ।
ख़ुशी-ग़म में “रजनी” नहीं होते शामिल
यहां लोग ऐसे भी कुछ हैं निराले।
-रजनी टाटस्कर
भोपाल (म.प्र.)
