ऐसा कुछ कहने की चाह में
जो न कहा गया
मौन हूँ कई दिनों से
जो है बात मन में
वह क्या किसी की स्मृति में नहीं ?
नहीं आई क्या कभी किसी की जिह्वा पर?
पेड़ क्या नहीं लहराए हवा में?
नदी क्या नहीं मुड़ी बल खा कर ?
कब नहीं छोड़ी गगन अपनी गर्जना?
धरती ने कब त्यागी अपनी गति?
एक कविता निःश्वास लेकर
ठिठकी खड़ी रह गई
कहने को क्या शेष रहा?
कुछ ऐसा ही अशेष कहने की चाह में
मौन हूँ कई दिनों से।
-शुचि मिश्रा
