हम दोनों के बीच
यह मौन
क्या तोड़ा नही जा सकता
क्या शब्दों के वे सारे सेतु
जो हमें
कल तक बाँधे थे,
टूट गए?
याद है यह जगह..?
जहाँ से कई झरने फूटे
और समुंदर में खो गए
तुम्हारे हाथों
के स्पर्श से
असंख्य सितार बज उठते
तुम्हारे करीब बैठी
सिगरेट के धुएँ में
नित नए आकार खोजती
वे सुरीले पल
अब नही सधते
क्यों न हम इस जड़ता
इस मौन को परे धकेल
नए शब्दों, नए संबोधनों
की तलाश करें
फिर
एक नया सेतु ही क्यों न बनाना पड़े…!
-सरस दरबारी
