यादों की गलियां

यादें जब यादों की गलियों से गुजरती हैं।
खामोशियां खामोशी से कुछ कहती हैं।
जब शीतल पवन का झोंका आता है।
और तन-मन-आत्मा को भिगो जाता है।
तब इन पहाड़ों-पत्तों-झरनों में ढूंढ़ता हूं
वो सब कुछ, जो कहीं छूट गया है।

वो पल, जो हमने साथ-साथ बिताए थे।
वो अकेलापन, जो हमने मिलकर बांटा था।
दीन-दुनिया के सारे ग़म भुला देने वाली
सांवले-सलोने मुखड़े पर खिली मुस्कान।
बार-बार देखने की उत्कंठा, पर दूर रहना।
और दूर रहकर भी, आसपास मंडराना।

इस दुष्ट होते समय में भी, मर्यादा की आबद्धता।
रूढ़ियों के बंधनों को तोड़ने की अकुलाहट।
ज्वार-भाटा बन मन-समुद्र में उठती शब्द-लहरें।
और, तटों से टकराकर लौटते थके-निराश शब्द।
निर्निमेष नयन और हथेलियों का कोमल स्पर्श।
बैठे हों सागर किनारे और आ जाए गहरी नींद।

-डॉ. विजयानन्द विजय
बक्सर (बिहार)

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