दिल ने कहा तुम्हें चलना होगा
एक बार फिर से संभलना होगा
बिखेरने न दो टूकडों में ख़ुद को
फिर इन्ही टूकडों से जुड़ना होगा
अब तो, दर्द की जागीर से खुद को बेदखल करना होगा
तुम्हें ख़ुद पर यकीन करना होगा
सारे दर्द को दफ़न करना होगा
एक नहीं अनेकों रंग है जिंदगी के
हर एक रंग में ख़ुद को रंगना होगा
चुपके से, दर्द की जागीर से ख़ुद को बेदखल करना होगा
यादों के गुलिस्तां में तुम्हें रहना होगा
कुछ यादों के फूल भी चुनना होगा
जहां भी देखो ग़म पसरा है, आहें हैं
तुम्हें एक गीत नया गुनगुनाना होगा
याद रहे, दर्द की जागीर से ख़ुद को बेदखल करना होगा
बहुत गहरी है जिंदगी, डूबो देती है
संभल संभलकर पार उतरना होगा
कल क्या होगा इस पर मत सोचना
हर पल को उत्सव में बदलना होगा
अजी, दर्द की जागीर को खुद से बेदखल करना होगा।
-पूनम झा
