वो दोपहर, अमराई में बिताना
नदी ताल-तलैयों में, कूद-कूद कर डुबकी लगाना
खेत-खलियान में, नंगे पाँव दौड़ लगाना
याद है वो, गाँव का जमाना
मेले में, गुड़ की जलेबी खाना
रेहट की, गुदगुदी का, लुफ्त उठाना
वो धूल उड़ाती, बैलगाड़ी के, पीछे-पीछे भागना
याद है वो, गाँव का जमाना
मिट्टी के घर-घूले में, गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाना
झूठ मूठ के, पकवान बनाकर, हिलमिल कर खाना
वो पिटृटू का खेल, डंडे से गिल्ली उड़ाना
याद है वो, गाँव का जमाना
वो रूठना, वो मनाना
खेल-खेल में, रिश्तांे की मिठास बढ़ाना
एक दूजे के घर जाकर, रिश्ते निभाना
याद है वो, गाँव का जमाना
मामा, मौसी, बुआ, चाचा, के आने पर
उत्सव से आनंद में, डूब जाना
तीज-त्योहार पर, सब गम भूल जाना
अपने-पराए संग, बैठ बतियाना
याद है वो, गाँव का जमाना
मन करता है, दौड़ चले, गाँव की ओर
फिर जी लें वही दौर
आओ चलें गाँव की ओर
आओ चलें गाँव की ओर
-डॉ. राधा दुबे
जबलपुर (म. प्र.)
