कुछ टूटे रिश्तों को याद करते हुए
सोने की नाकाम कोशिश करती,
मैं बचपन के ख़यालों में खो गई।
बचपन से ही माँ ने सिखाया था
रिश्तों को सहेजना और संजोना।
मैंने सीखा, समझा
और उन्हें बड़ी गंभीरता से अपनाया।
रिश्तों को मुट्ठी में बंद रखने लगी,
पर मैं बड़ी हुई, रिश्ते बढ़ते गए,
और मुट्ठी छोटी पड़ने लगी।
तब मैंने रिश्तों को
तिजोरी में रखना शुरू किया।
डरने लगी
कहीं कोई चोर उन्हें चुरा न ले।
जब जीवन के पचासवें दशक में पहुँची,
तो रिश्तों को लेकर
और अधिक सजग हो गई।
फिर उन्हें बिस्तर के नीचे
छिपाकर रखने लगी।
कभी सफ़ाई के दौरान
कुछ टूटे, कुछ गिरे, कुछ दरक गए,
फिर भी कुछ बच गए।
टूटे हुए रिश्तों को
फेविकॉल से जोड़ने चली,
पर रिश्ते कच्चे थे,
जोड़ उतना मज़बूत बन न पाया।
साठ के दशक में पहुँची
तो गिनने लगी
कितने रिश्ते बचा पाई हूँ।
वे अंगुलियों पर गिने जाने लायक़ ही थे।
पर जो बचे थे,
वे सच्चे रिश्ते थे,
अनमोल मोती थे।
अब मुझे कोई मशक्कत नहीं करनी,
न कोई डर है,
न उन्हें सँवारने की चिंता।
समझ गई हूँ
मैं रहूँ या न रहूँ,
ये रिश्ते बने रहेंगे,
मोती बनकर
अपनी चमक बिखेरते रहेंगे।
-पुष्पा अरविंद शर्मा
नागपुर
