कभी सिद्ध-सरल, सुलझी-सुलझी,
कभी पतंग-डोर सी उलझी-उलझी।
नैना सपनों से भरे-भरे,
कोरों से अश्रु-कण झरें-झरें।
होठों पर वीणा की तान सजे,
यौवन से मधु की रसधार बहे।
एक चंचल-चंचला नदिया सी,
कभी लहरों संग बिलखती सी।
बचपन की देहरी से चली-चली,
नव आनंद की आस में बढ़ी-बढ़ी।
सोती रातों में जागी सी,
खुली आँखों से मदहोश रही।
दर्पण की अंतरंग सखी-सखी,
पलकों से ढलकी अभी-अभी।
देखो तो सपनों की परियों सी,
पर अंदर से दुर्गा-काली सी।
पर अंदर से दुर्गा-काली सी।
-अनुपमा शर्मा
रुड़की

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Shaandaar👌