लहर आई तो साहिल पे

लहर आई तो साहिल पे कोई पैकर नहीं बचता
बचा रहता है कुछ कुछ, और कुछ अक्सर नहीं बचता

सिपाही का हो,क़ातिल का हो, या फिर मौलवी का हो
कि जब सैलाब आता है तो कोई घर नहीं बचता

मेरी बस्ती में जब बीमारियों का दौर चलता है
शहर के अस्पतालों में कोई बिस्तर नहीं बचता

सम्हलना कामयाबी की बुलंदी पर खड़े हो तुम
कि इन ऊंचाइयों से कोई भी गिर कर नहीं बचता

अजब दस्तूर दुनियाँ के तिलिस्मी मैक़दे का है
कोई साक़ी नहीं बचता कोई सागर नहीं बचता

-इन्दु श्रीवास्तव

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee