लहर लहर से बगावत में भी कमी न हुई
ये ज़िन्दगी तो कभी प्यार की नदी न हुई
किसे बताएँ सबक ज़िन्दगी का हम यारों
कटी जो पेड़ से फिर डाल वो हरी न हुई
हज़ार फूल बिछाए किसी के क़दमों में
भरी थी राह जो काँटों से मखमली न हुई
अमीर लोग ही पत्थर चला रहे खुद पर
तमाम शह्र की दुश्मन ये मुफलिसी न हुई
अजीब शख्स है दिनकर जो आसमानों पर
चढ़ा तो खूब मगर घर में रौशनी न हुई
-दिनकर राव दिनकर
