फिर वही कुआ, वही खेत होंगे
चार दिन ही सही भले, मेरे होंगे
लौट रहा हूँ गाँव मेरे
अपनी यादों के जंगल में
फिर से ढूँढने अपने यार पुराने
वो भी क्या दिन थे जब
नल नहीं आए थे गाँव में
कुए पर ही हाल चाल पूछते थे
भाभी, बहिन का मज़ाक
वो कुए से पानी खींचना
सब खा गया है विकास राक्षस
नींबू, करोंदे , जामुन, आम
लाल मिर्च , लहसुन की चटनी
चूल्हें में सिंकी रोटी पर कच्ची लौनी
मामी और भाभियों की जबर्दस्ती
शहर में किराए पर भी नहीं मिलती
काँपते हुए हाथ आज भी
सिर पर जब आते हैं , मैं बच्चा हो जाता हूँ
उस बूढ़े बरगद को बाहों में भर
अपना बचपन याद करता हूँ
चबा लेता हूँ आज भी माती सनी मूली
बिटोरे पर पड़े घिया आज भी भाता है
गाय का घी , आज भी सुहाता है
आज भी बहिन झगड़ती है , घी डालते हुए
कि भाई कमजोर हो गया है, खा ले न
अनायास वो माँ बन जाती है मेरी
भले उम्र बढ़ चुकी है, लेकिन
वे नज़र आज भी प्रेम से भरी हैं
वहाँ मैं उनके जैसा हूँ , दिल्ली वाला नहीं
आज भी भेड़ का दूध पी लेता हूँ खुशी से
एक पेट है, कई चूल्हों से आता है खाना
जमीन पर बैठ, जुड़ जाता हूँ सबसे
मेरा गाँव ऐसा ही है, अब ढिबरियाँ नहीं हैं
बल्बों की चकाचौंध में भी , गाँव प्रेम में डूबा है
यहाँ कोई पराया नहीं है, सब रिश्तों में जी रहे हैं
ताऊ, चाचा, बाबा , नाना , भैया सब शब्द ज़िंदा हैं
मैं मेहमान नहीं उनका किसी रिश्ते से अपना हूँ
मेरी जड़ें आज भी मजबूत हैं , मैं आज भी ज़िंदा हूँ
मैं उन सब के लिए जैसे कोई उत्सव का दिन हूँ
-केदारनाथ शब्द मसीहा
