वर्तमान टूटे कंधों पर
बोझ ढो रहा है अतीत का
हम भविष्य के लिए समर्पित
निष्ठाओं को आँक रहे हैं
अर्द्धनग्न मन्तव्य उभरकर
बजा रहे
छज्जे पर थाली
और किसी अज्ञात शत्रु को
देते रहते
खुलकर गाली
कहीं मनोगत, कहीं मुखर हैं
आशय जाते हुए समय के
फटे चीथड़ों पर रेशम के
कितने बूटे टाँक रहे हैं
आकर्षक पूँजी-निवेश के
सभी विकल्प
थके-हारे हैं
सौदागर तो दूर खड़े हैं
मंडी में
बस बंजारे हैं
बस संवेदी सूचकांक पर
नज़र गड़ी है हर दलाल की
लेन-देन के दृश्य-पटल पर
भौचक हो सब झाँक रहे हैं
जो अपनाया गया विगत में
क्या वह सब ही
दुहराना है
निरपराध शम्बूक पूछता
कैसा राम-राज्य
लाना है
सीता को वनवास दिया क्यों
उसने क्या अपराध किये थे
उत्तर नहीं मिला लेकिन सब
सच्चाई को ढाँक रहे हैं
हर युग के सम्भ्रान्त पहरुवे
विस्मित रहे
समय के तट पर
समुचित समाधान दे पाये
नहीं किसी आये
संकट पर
जहाँ समय की आहट पाकर
भी बदलाव नहीं कर पाये
रुग्ण मानसिकता के वाहक
युग का कचरा फाँक रहे हैं!
-जगदीश पंकज
