रोज़ नन्हें को लाद पहुँच जाती है
तै गंतव्य पर …
मिट्टी के टीलों पर कलेजे को रख
चल देती , जहाँ पत्थरों के हैं ढेर
तोड़ती भारी हथौड़े से
ढाँपती जाती झाँकता तन
फटे आँचल से
काग दृष्टि से देखती नन्हें को
गाती जाती मन की पीड़ा
बेसुरे राग में
कभी ढोती गारा , मिट्टी, ईंट
चाहती बनती रहे इमारतें
कि बनी रहे आग चूल्हे में
छालों भरी हथेलियों में रखी दहाड़ी
लगा लेती माथे से
अपनी आराधना का
प्रसाद….!
-सरस दरबारी
