वृक्षों की व्यथा

कितने परिंदे बेघर हुए, तुम क्या जानो कुल्हाड़ी
हमने अपने को शहीद कर किसी के घर सजाए हैं।
हमारे बदन पर जब-जब चली हैं आरियां उनकी
उफ़ तक हमने न की, दर्द कितने हमने छुपाए हैं।
हम तो मौन रहे, कुछ न कर पाए हैं।

थके हुए मुसाफिरों को पनाह दी है हमने ही
मंज़िलों तक के सफ़र उनके सुहाने बनाए हैं
ग़र कभी भटक कर आ गया इधर राहगीर कोई
अपनी शाखों को हिलाकर उसे रस्ते सुझाए हैं।
अच्छाइयों का ये सिला पाए हैं।

कुछ की रोज़ी रोटी भी निर्भर हमारे ही ऊपर
दो वक्त घर में चूल्हे उनके हमने जलाए हैं
हमारी हवा से सांस लेता है इंसान रोज़ ही
उसके लिए संजीवनी बनकर प्राणों की छाए हैं
परोपकार हित ज़िन्दगी लगाए हैं।

आंखों को सुकून देती है हरियाली हमारी तो
सारी धरती पर गलीचे हरे हमने बिछाए हैं
लेकिन न जाने क्या दुश्मनी है इंसान की हमसे
अपने स्वार्थ की खातिर हमारे अंग कटाए हैं
हमने छुप-छुप कर आंसू बहाए हैं।

हरे पेड़ों को काट कर कालोनियां बना डालीं
इस नासमझी से उसकी फिर आती आपदाएं हैं
कुदरत से खिलवाड़ करना अच्छा तो नहीं कभी भी
उसकी इस हरकत से पीढ़ियों ने कष्ट उठाए हैं
इस नादानी पर कुछ न कह पाए हैं।

-विजया गुप्ता सुवर्ण किंशुक

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