ग़ज़ल 212 212 212 212
चांद था वो सितारा नहीं हो सका।
इसलिए वो हमारा नहीं हो सका।
रूख से उनके परदा हटा ही नहीं,
देखना फिर गॅवारा नहीं हो सका।
चाहते थे यही मेरे अपने सभी,
मैं रहूं पर नकारा नहीं हो सका।
बोलता ही रहा झूठ जब आईना,
सच में सच का नजारा नहीं हो सका।
प्रेम क्या चीज़ होता ये समझा नहीं,
दिल था शोला, शरारा नहीं हो सका।
दर्द ही दर्द मुझको मिला है मगर,
टूट कर मैं, बिचारा नहीं हो सका।
मैं तुझे चाहता तुम किसी और को,
कुछ घड़ी भी, तुम्हारा नहीं हो सका।
आज भी मेरे दुश्मन हैं ज़िंदा यहां,
वार उन पर करारा नहीं हो सका।
अब ‘अकेला’ वही है यहां आज कल,
जिसका कोई, सहारा नहीं हो सका।
-संतोष सिंह ‘अकेला’
