कभी कभी कुछ महसूस होता है,
और कभी कुछ भी नहीं,
कभी कुछ शब्द माध्यम बनते हैं,
और कभी बनते लफ्ज भी नहीं।
कभी कागज़ की कश्ती पार लगाती है,
कभी मिलती कश्ती ही नहीं,
कभी सारथी बनते खुद पालनहार है,
और कभी राह ही मिलती नहीं।
कभी खामोशी समझ आती हैं,
और कभी समझते बातें नहीं,
कभी हाल अपना सुनाते किसी को,
और कभी कुछ भी जताते हैं नहीं।
कभी खुद से ही हम उलझते हैं,
कभी खुद से शिकायत भी नहीं,
कभी दुनिया में सब अपने लगते है,
कभी अपना साया ही नहीं।
कभी यादों के भँवर घेरते हैं,
कभी याद आता बीता पल भी नहीं,
कभी आँखों में दरिया बहता है,
कभी आँखों में रहता जल भी नहीं।
कभी भीड़ में खुद को खोजते हैं,
कभी तन्हाई भी खलती नहीं,
कभी धूप में छाँव मिल जाती है,
कभी छांव ही मिलती नहीं।
कभी बंदगी में सिर झुक जाता है,
कभी मिलती कोई चौखट नहीं,
कभी शोर में संगीत सुन लेते,
कभी सुनाई देती आहट नहीं।
कभी गिरकर भी संभल जाते,
कभी संभलकर भी संभलते नहीं,
ज़िंदगी एक पहेली हैं या पहेली ज़िंदगी ,
इसका मुकम्मल हल नहीं।
“शायद यही जिंदगी है।”
-डॉ मंजू तिवारी
