श्मशान घाट – एक अनदेखा संवाद

अनदेखा संवाद अपनी ही धुरी पर निरंतर परिक्रमा करता रहता है।
वक्त-बेवक्त, दिन-रात।
जागते हुए भी और सपनों की गहराइयों में भी।
कभी किसी चेहरे के साथ, कभी किसी स्मृति के साथ, और कभी किसी ऐसे एहसास के साथ जिसका कोई नाम नहीं होता।
जीवन में अनेक लोग आते हैं – कुछ ठहरते हैं, कुछ चले जाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनसे कभी भेंट नहीं हुई, फिर भी वे वर्षों तक हमारे भीतर बसे रहते हैं।
कुछ चेहरे देखे हुए होते हैं, कुछ केवल महसूस किए हुए।
और कई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी और से नहीं, अपने ही भीतर बैठे किसी अनजान यात्री से संवाद कर रहे होते हैं।
मैंने ऐसे संवाद अनेक स्थानों पर किए हैं …
कभी इतिहास के गलियारों में,
कभी मिथकों के पात्रों के साथ,
कभी स्वप्नों के लोक में,
और कभी अपनी ही चुप्पियों के बीच।
पर उस दिन संवाद ने स्वयं मेरा हाथ थाम लिया और मुझे एक ऐसे स्थान पर ले आया, जहां जाने की इच्छा शायद किसी की नहीं होती ! –
श्मशान घाट !
एक ऐसा स्थान, जिसका नाम सुनते ही मनुष्य के भीतर एक अनकहा संकोच जाग उठता है।
जहां जाने से लोग बचते हैं। जहां पहुंचकर लोग शीघ्र लौट आना चाहते हैं।
जहां हर कोई किसी और को छोड़ने आता है, पर लौटते समय अपने भीतर कुछ लेकर जाता है।
संध्या उतर रही थी।
आकाश धुएं और धुंधलके के बीच कहीं विलीन हो गया था।
कुछ चिताएं बुझ चुकी थीं, कुछ अब भी जल रही थीं।
कुछ लोग रो रहे थे, कुछ मौन थे।
और कुछ ऐसे भी थे जिनकी आंखों में आंसू नहीं थे, पर भीतर पूरा समुद्र उमड़ रहा था।
मैं दूर पड़े एक पत्थर पर जाकर बैठ गई।
अजीब बात थी,
इतने लोगों के बीच भी वहां एक विस्तृत अकेलापन था।
और उस अकेलेपन के भीतर एक अद्भुत शांति।
मैंने सामने जलती हुई चिता को देखा।
अभी कुछ ही क्षण पहले तक वह किसी का नाम रही होगी …
किसी का अभिमान,
किसी का संघर्ष,
किसी का परिचय,
किसी का “मैं”।
और अब…
सब कुछ अग्नि को समर्पित था।
तभी मुझे लगा, जैसे कोई मेरे पास आकर बैठ गया हो।
मैंने मुड़कर देखा, वहां कोई नहीं था – पर एक उपस्थिति स्पष्ट थी।
इतनी स्पष्ट कि जैसे मौन स्वयं आकार लेकर मेरे बगल में बैठ गया हो।
मैंने धीमे स्वर में पूछा –
“कौन?”
उत्तर आया,
“जिससे तुम जीवन भर बचती रही हो।”
मैं चौंक गई।
“मृत्यु?”
एक हल्की, शांत हंसी सुनाई दी।
“नहीं।
मृत्यु नहीं।
सत्य।”
मैं निःशब्द रह गई।
सामने चिता की लपटें उठ रही थीं।
पीछे संसार अपने शोर में व्यस्त था।
और बीच में मैं थी !!!-
अपने समस्त प्रश्नों के साथ मैंने पूछा –
“क्या श्मशान इतना महत्वपूर्ण है?”
उत्तर आया,
“नहीं।
श्मशान महत्वपूर्ण नहीं है।
श्मशान में टूटने वाले भ्रम महत्वपूर्ण हैं।”
मैंने पहली बार सही मायनों में चारों ओर देखा।
वहां न कोई अमीर था,
न गरीब।
न विजेता,
न पराजित।
न प्रसिद्ध,
न गुमनाम।
अग्नि सबका परिचय एक ही भाषा में पढ़ रही थी।
मैं बहुत देर तक मौन रही।
फिर पूछा –
“क्या यही अंत है?”
उत्तर आया –
“यही प्रश्न हर चिता पूछती है, और हर जीवित मनुष्य उससे बचकर निकल जाना चाहता है।”
हवा में राख का एक सूक्ष्म कण उड़ता हुआ मेरी हथेली पर आ गिरा।
मैं उसे देर तक देखती रही।
तभी वह स्वर फिर सुनाई दिया,
“तुम जीवन को अगर समझना चाहती हो, तो मृत्यु से मत डरो।
उसे सुनो।
क्योंकि जीवन अपनी सबसे सच्ची बातें वहीं कहता है, जहां उसका अहंकार जल रहा होता है।”
अब मैं समझ चुकी थी कि
यह संवाद किसी मृत व्यक्ति से नहीं था।
न मृत्यु से, न किसी आत्मा से।
यह संवाद उस सत्य से था, जिसे हम जीवन भर टालते रहते हैं।
और पहली बार श्मशान घाट मुझे भयावह नहीं लगा,
बल्कि एक विद्यालय जैसा प्रतीत हुआ ।
जहां जीवन का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया जाता है ।
कि जो नश्वर है, उसे पकड़कर मत बैठो,
जो शाश्वत है, उसे पहचानो।

मैंने अपनी अगली जिज्ञासा को संभाला।
सामने अग्नि की लपटें अब धीमी पड़ रही थीं।

और भीतर एक नया प्रश्न जन्म ले चुका था –
“यदि सब कुछ यहीं छूट जाना है, तो फिर मनुष्य जीवन भर इतना संग्रह क्यों करता है?”
कुछ क्षणों तक मौन छाया रहा।
फिर उसी स्वर ने कहा –
“क्योंकि मनुष्य वस्तुओं का संग्रह नहीं करता, वह सुरक्षा का संग्रह करता है।
धन नहीं, आश्वासन जोड़ता है।
संपत्ति नहीं, भय से बचने के उपाय इकट्ठे करता है।
उसे लगता है कि जितना अधिक उसका होगा, उतना ही कम वह खोएगा।
पर जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि जो जितना अधिक पकड़ता है, वह उतना ही अधिक खोने से डरता है।”

मैं सुनती रही और मुझे लगा,
अनदेखा संवाद अभी आरम्भ हुआ है।
श्मशान केवल स्थान नहीं था।
वह एक आइना था,
जिसमें जीवन पहली बार बिना किसी आभूषण के दिखाई देता है।
और शायद इसी कारण,
लोग वहां किसी और को विदा करने आते हैं,
पर लौटते समय अपने भीतर किसी भ्रम का अंतिम संस्कार कर जाते हैं।

-रश्मि प्रभा

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