मानवीय संवेदनहीनता आदिकाल से चला आ रहा एक मानसिक रोग है।
और आज के युग में तो यह चरम पर है।
अस्पताल, वृद्धाश्रम, अनाथ लय और क्षयरोग से पीड़ित लोगों का क्षयरोग उपचार केन्द्र के साथ साथ मानसिक रोगियों का अस्पताल आदि संवेदनहीन समाज का देन है।
किसी भी विषम परिस्थितियों से सामना न कर रोगियों, वृद्धों से अलग रहना एक जीवन शैली बन गई है।
दुर्घटना में घायल व्यक्ति या परिवार भी सही समय पर मदद न मिलने से प्राण गंवा रहे।
इन सबों का कोई मददगार भी हैं तो वे भी एक संस्था खोलकर सरकारी मदद से सेवा दे रहे।
उसी में मुनाफा भी कमा रहे।
व्यक्तिगत और निस्वार्थ संवेदना किसी में नहीं है।
आए दिन हत्या, चोरी -डकैती आदि भी संवेदनहीनता का परिचय दे रहे।
कोई खबर सुकूँ नहीं देती।
कारण – जाति पाति, निज स्वार्थ, झूठ की व्यस्तता, पारिवारिक परवरिश का आभाव, बड़े बुजुर्गों से दूरियाँ, अच्छी शिक्षा का आभाव और समाज द्वारा युवाओं को मोनिटरिंग न करना।
जागरूकता का आभाव आदि बड़े कारण हैं।
समाधान – पुराने जमाने में जो चौपालें गाँवों हुआ करते थे, उन चौपालों की आज भी जरूरत है।
चौपालों के माध्यम से हर परिवार और उनके बच्चों की गतिविधियों पर चर्चा और सुधार की बातें कर बच्चों के बिगड़ते लक्षण में सुधार किया जा सकता है।
समाजिक एकता और सौहार्द की बातें सिखलाई जा सकतीं हैं।
आपसी प्रेम और भाईचारे से बच्चों में स्वत: संवेदना जगेगी और मानव जीवन मूल्य का पता रहेगा।।
-अजय पाण्डेय बेबस
