संवेदनहीन होता समाज

किसी वृद्ध ने बहुत ही सुंदर बात कही है,
आज की पीढ़ी इकठ्ठा करने के लिए जी रही है,
और हमारी पीढ़ी इकठ्ठा रहने के लिए जीती रही।
जब से सबके अपने अपने मकान हो गए
सगे भाई भी एक दूसरे के मेहमान हो गए

यह आज की कड़वी सच्चाई है। आजकल बच्चे माता-पिता की इज्जत नहीं करते। पिता को ही झुकना पड़ता है। बच्चों को माता-पिता की जायदाद और वसीयत तो चाहिए लेकिन कोई उनकी सेवा करना नहीं चाहता। हर बेटा यही चाहता है कि पिता की सारी जायदाद उसी को मिल जाए जिसके कारण विवाद भी खूब होते हैं। भाई …भाई का दुश्मन बन जाता है। बहन भाई में प्यार खत्म हो जाता है। दूरियाँ बढ़ जाती हैं।एक ही घर में रहते हुए अजनबी की तरह व्यवहार करते हैं।ऐसे एक नहीं,अनेक घर देखे।और जो माता-पिता और बहन- भाई के प्रति संवेदनहीन हैं, ऐसे लोगों से अन्य लोगों के प्रति संवेदना की उम्मीद कैसे की जा सकती है। लोग सड़कों पर बहुत कुछ गलत होता हुआ देखते हैं किसी को मरता हुआ भी देखते हैं। दुष्कर्म होते भी देखते हैं। उसका वीडियो तो बनाते हैं; किंतु उसका विरोध कभी नहीं करते।मदद के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाते।हम कितने संवेदनहीन हो गए हैं। कभी यह नहीं सोचते कि ऐसा हमारे परिवार के साथ भी हो सकता है।
लेकिन बात ले- देकर वहीं आ गई कि कौन सा परिवार? क्या वह परिवार जिसमें माता-पिता और भाई बहन शामिल नहीं हैं? केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे शामिल हैं। भला ऐसे लोग अन्य के परिवार को अपना परिवार कैसे मान सकते हैं और किसी के प्रति संवेदनशील कैसे हो सकते हैं?
वैसे भी आजकल संस्कार तो बिल्कुल ही लुप्त हो गए हैं। बड़ों से कैसे बोलना है, बच्चे इसकी तमीज तक भूल गए हैं।उन्हें रिश्तों का मोल समझ नहीं आता। केवल स्वार्थ साधने के लिए रिश्ते बनाए/निभाए जाते हैं। वरना तो कौन किसका भाई और कौन किसी का माँ-बाप। माँ-बाप तक से तू- तड़ाक पर उतर आते हैं। ये वो लोग हैं जो बहुत पढ़े लिखे हैं और खुद को बहुत समझदार समझते हैं।लेकिन समझदार तो वो लोग हैं जो गुस्से में भी बात करने की तमीज नहीं भूलते।
स्वार्थ, ईर्ष्या और लालच के कारण ही रिश्ते निभाए जाते हैं या समाज के डर से मजबूरी में ढोए जाते हैं। यह भी शुक्र है कि समाज का डर है; क्योंकि आजकल तो जहाँ देखो, वहीं यह सुनने में आता है कि बच्चों ने माता-पिता की जायदाद हड़प ली और उन्हें वृद्ध आश्रम के हवाले कर दिया या माता-पिता दोनों में से कोई एक एकाकी रह गया तो अपने साथ ले जाने के नाम पर बच्चे उसकी जायदाद बिकवा देते हैं और फिर उन्हें एयरपोर्ट या प्लेटफार्म पर अकेला बेसहारा छोड़कर खिसक जाते हैं।
हम इतने अधिक संस्कारहीन व संवेदनहीन हो गए हैं कि सारी मर्यादा लाँघ रहे हैं। अपने संस्कार… अपनी संस्कृति… अपनी सभ्यता को ताक पर रखते जा रहे हैं। सारे नैतिक मूल्य खोते जा रहे हैं।
आज रिश्तों की संवेदनाएं मर रही हैं। संबंधों की मधुरता के लिए संबोधन की मिठास अनिवार्य है। एक बात जरूर है कि परिवार में हर छोटी बड़ी बात को इशु नहीं बनाना चाहिए। रिश्तों व हालातों से थोड़ा समझौता कर लें तो पूरा जीवन ही सुंदर हो जाता है ।
लोग कहते हैं कि जब कोई अपना दूर चला जाता है तो बहुत दर्द होता है,किन्तु उससे भी ज्यादा दर्द तो तब होता है जब कोई अपना पास होकर भी दूरियाँ बना लेता है।आजकल रिश्तों की हकीकत यही है।
रिश्तों की अदालत में जो पैरवी करनी पड़ती है,उसमें मीठी वाणी का बड़ा योगदान होता है।झाड़ू में जब तक बन्धन होता है, तब तक वो कचरे को साफ करती है। बन्धन खुल जाने पर झाड़ू खुद कचरा बन जाता है।
इसलिये हमेशा अपनों से बंधे रहिए।एक एक से हम अनेक बनते हैं। इस बंधन को बनाए रखें।
जो सुख में साथ देते हैं वे रिश्ते होते हैं और जो दुख में साथ देते हैं, वे फरिश्ते होते हैं।

-राधा गोयल
विकासपुरी (दिल्ली)


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