संस्मरण

बात उन दिनों की है जब बी. ए. मैं पढ़ रही थी।घर से दूर शहर में अपनी बड़ी बहन के परिवार के साथ रह रही थी। मुझे बहुत अच्छे से याद है वो दिन.. आज तक भी भूल नहीं पाई । सुबह- सुबह गाँव से एक आदमी बहन के घर आया। माथा ठनका कि इतनी सुबह यह यहाँ क्यों आया ? मेरे बड़े भाई वहीं पर शहर में घर बना रहे थे ।बहन ने जगत से पूछा -“क्या बात है इतनी सुबह कैसे आए गाँव में सब ठीक तो हैं।” उसने दीदी से कुछ कहा।”कुछ नहीं पिता जी की तबियत कुछ ख़राब है इसलिए तुम्हें व भाई को लेने आया है।”
हमारे गाँव से शहर आने वाले रास्ते में पहाड़ी नदी आती है यह उस समय की बात है जब नदी पर पुल नहीं पड़ा था और न ही टेलीफ़ोन की सुविधा थी।
पिता जी बीमार हैं सुन मैं रो पड़ी दीदी बोली – “ मत रो पिता जी को कुछ नहीं होगा।” मैं और दीदी चल पडे रास्ते से भाई को भी सब बताया साथ ले लिया । जुलाई माह था बहुत बारिश हो रही थी, मैं दौड़ रही थी दीदी कहती धीरे चल मुझे लग रहा था जैसे मेरे सोचने की ताक़त खत्म हो गई थी बस के द्वारा थोडी दूर तक आए आगे पंद्रह किलोमीटर पैदल जाना था , चप्पल हाथों में उठा कर भागना शुरू कर दिया सब मेरे पीछे दौड़ रहे ।भाई ने जगत को कहा कि वह दीदी के साथ आए और मेरे साथ चल पड़े
नदी तक आ पहुँचे बरसाती पानी के कारण नदी उछाल पर थी नदी पार करने के लिए ट्राली लगी थी भाई बोले- “चल ट्राली से चलें।” हम दोनों ने नदी पार की और फिर दौड़ना शुरू कर दिया । आँखों से लगातार आँसू बरस रहे थे .. चप्पल हाथ में ले ली भाई की बड़ी बड़ी आँखें रोकर लाल हो गई
लगभग चार किलोमीटर चढ़ाई का रास्ता भागते तय किया पगडंडी आ गई। घर यहाँ से लगभग दो किलोमीटर दूर रह गया भाई ने पकड़ कर मुझे चप्पल पहनाई।
गाँव पास आने लगा मेरा दिल ज़ोर- से धड़कने लगा कि पता नहीं क्या देखेंगे।घर पहुँचते ही देखा कि बहुत लोग बरामदे में बैठे है मेरा शरीर निढाल सा हो गया अचानक भाई ने मुझे देख लिया कंधों से पकड़ लिया अंदर लोग कमरे में बैठे थे पिता जी को जमीन पर लिटाया हुआ था वह ढके हुए सीधे लेटे हुए थे गाँव के डॉक्टर मामा उनके सिरहाने बैठेथे
उन्हे देखते ही मैं अचेत हो गई। मेरे कानों में मेरी माँ की आवाज़ सुनाई दे रही थी – उठ बेटु
आँखें खोल तेरे पिता जी ठीक हैं।मैं धीरे-धीरे आँखें खोलती हूँ उठ कर पिता जी के पास जाकर उनसे लिपट रोने लगती हूँ। पिता जी लम्बी- लम्बी साँसें ले रहे थे सभी के चेहरों पर चिंता व उदासी साफ़ झलक रही थी। डॉ मामा ने मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा – “बेटा उठो अपने पिता के पास बैठ कर गीता पढ़ो तुम समझदार हो ।”मैंने बेबस पर उम्मीद भरी नज़र से उनकी तरफ़ देखा और गीता पढ़ने लगी बीच में सिसकती रही रात बहुत भारी थी सब सारी रात बैठे रहे । भोर की किरण हमारी जिंदगी को अंधेरा कर गई , पिता जी हमें छोड़कर चले गए हमें लगा हमारी सारी दुनियाँ वीरान हो गई।
हृदय का जो कोना उस दिन पितृ वियोग से रिक्त और सूना हुआ वह कभी सिक्त न हो सका।
आज भी उस दिन के याद करती हूँ तो आँखें नम हो जाती हैं। पिता जी को गए बरसों बीत गए।

-निर्मल सूद
चण्डीगढ़

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