विषय-भाव पहले आता कर्म होता बाद में ।
अतः सकारात्मक चिंतन करने का प्रयास करें।
जीवन में प्रत्येक घटना का घटित होना तय है और सृष्टि के इस चक्र में हममें से कोई भी बाधा नही डाल सकता। इस कारण ही हमें सुख दुःख की अनुभूति समय समय पर आनंदित एवं निराशा से भर देती है। हममें से प्रत्येक इस भावों को महसूस कर इनका रस भी लेते है किंतु हमारे विचारों एवं हमारी महत्वाकांक्षाओं के विपरीत परिणाम आने पर हम अवसाद में भी कई बार चले जाते है।
हमें सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन के परिणाम हमारे हाथ में नही है, परन्तु उस समय किया गया कर्म एवं उसका भाव हमारे हाथ में होता है।
उदाहरण के लिए – एक व्यक्ति पानी पीने के लिए पानी से भरा गिलास उठाता है और पानी पी लेता है। यहां “मन में पानी पीने का विचार आना”- यह हुआ प्राथमिक कर्म एवं “गिलास में पानी डाल कर पानी पीना” हुआ उसका द्वितीय कर्म।
इसी प्रकार से जब भी हम कोई भी कार्य करते है सृष्टि में लोगो के समक्ष अथवा हमारे समक्ष जो परिणाम आते है वह द्वितिक कर्म होते है। उसका भाव सकारात्मक अथवा नकारात्मक का मन में आना ही
हमारा प्रथम कर्म बन जाता है जिसके परिणामस्वरूप ईश्वर एवं यह ब्रह्मांडीय शक्तियां उसे सफल करने में सहयोग प्रदान करती है। जिसके परिणामस्वरूप हमें सुख अथवा दुख के फल की प्राप्ति होती है।
कहा भी जाता है ईश्वर स्वयं भावों को महत्व देते है- किस भाव से
उन्हें भक्त पूजता है अथवा स्मरण कर कार्य में सहयोग की विनती करता है।
यहां यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि एक व्यक्ति के द्वारा किए गए कर्म का विचार मात्र से ही उसके परिणाम का प्रभाव आस पास के अधिकांश लोगों पर पड़ता है फिर वह सकारात्मक हो अथवा नकारात्मक।
कहा भी गया है – मनुष्यों को यथासंभव प्रत्यन यह करना चाहिए कि यदि बात नकरात्मक है तो उस सुनी हुई बातों को भी सुलझाने का प्रयास करें तुरंत परिणाम तक पहुँचने से पूर्व।
यह भी सत्य है कि कभी कभी हमारे सकारात्मक चिंतन करने पर किये गए कर्म के प्रभाव का परिणाम सकारात्मक नही होता तो सदैव ध्यान रखें कि यह कोई प्रारब्ध ही है जिसके कारण नकरात्मक परिणाम का फल मिलता है। उस समय भी हिम्मत से ईश्वर की इच्छा समझ सकारात्मक विचार सोचने का प्रत्यन करें क्योंकि इससे प्रारब्ध तो कटेगा ही जो कि कट रहा है किंतु भविष्य के लिए सकारात्मक राह बनेगी।
अतः हमेशा यह प्रयास करें कि सभी प्राणियों जीव जंतुओं के लिए मन में शुभ भाव ही विचार रूप में प्रकट हो। यह सत्य है कि
परिस्थितियां हमारे हाथ में नही होती परन्तु प्रत्यन तो यही करना
चाहिए कि सभी के लिए अच्छी भावना हमारे भीतर जन्म ले।
आगे तो प्रभु की इच्छा।
-विशाखा सिंघल
