सुबह का सुहावना समय था,शर्मा जी पार्क से टहल कर लौट रहे थे,तभी बगल के मकान की खिड़की से किसी छोटी सी लड़की ने आवाज दीअंकल!! उन्होने पीछे मुड़कर देखा और मुस्कराए”अरे,यह तो प्रिया है,वह उसकी ओर बढ गये”हैलो प्रिया बेटे,कैसी हो?”
“मैं तो अच्छी हूं अंकल, आप कैसे हैं,यह लाल गुलाब आपके लिए,,,,”
प्रिया के हाथों का लाल गुलाब उसके मासूम सुंदर चेहरे की तरह ही सुन्दर था,यह तो रोज का ही नियम था,जब भी वे टहलकर लौटते प्रिया उन्हें अपने हाथों से उगाये गुलाब का फूल जरूर भेंट करती,,शर्मा जी का दिल भर आया, उन्होने फूल लिया और प्यार से उसके गालों को थपथपा दिया,,,
प्रिया अपने पोलियो ग्रस्त पैरों के कारण कहीं आ जा नहीं पाती, जन्म से ही दोनों पैरों से लाचार प्रिया कभी वैशाखी तो कभी व्हील चेयर का सहारा लेकर चलती थी, महीने में एक बार डाक्टर के पास जाकर अपनी जांच करवाते समय उसे अत्यंत पीड़ा के क्रम से गुजरना पड़ता, है,,वह रोज इस खिड़की में आकर बैठती है, उसे लोगों का इधर से उधर जाना, बच्चों का दौडना,, और उन्हें खेलते हुए देखना बहुत अच्छा लगता है,,,वह छोटी सी चिड़िया जो रोज उसके हाथों पर आकर बैठ जाती है वह भी प्रिया की दोस्त हैं, लेकिन उसके सबसे प्यारे दोस्त हैं,शर्मा अंकल,,,,,,जो रोज सुबह टहलने जाते समय उसके पास बैठकर उसे बहादुर और बुद्धिमान बच्चों की कहानियां सुनाया करते हैं,,,
सात वर्ष की छोटी सी उम्र में पिता को खो दिया था उसने,वे पंजाब प्रांत में अपना व्यवसाय करतें थे,एक दिन भरी बस को आतंकवादियों द्वारा उड़ा दिया गया था,प्रिया के पिता भी उसी बस में थे,,,अब वह अपनी मां के साथ अकेली रहती थी, मां कपड़े सिलाई करती और पैसे कमाती,,,प्रिया का दुख उसकी मां को रातों को अक्सर रुलाया करता था,,प्रिया के शर्मा अंकल हमेशा उनकी मदद के लिए तैयार रहते थे,उन्होने प्रिया को छोटी कक्षाओं की कई किताबें ला दी थीं,,,उसे चित्रकला की एक कापी और रंगों का डिब्बा भी दिया था,उन्होने,,,रोज इसी खिड़की पर बैठ कर वह आते जाते लोगों,,छोटी सी चिड़िया,, आंगन के नीम की तस्वीरें बनाया करती थी, उसने शरमा अकल की भी एक तस्वीर बनाई थीमूछो वाली,,जिसे देखकर वो बहुत देर तक हंसते रहे थे,,प्रिया की अनगढ कला का जादू अब सिर चढ़कर बोलने लगा था, उसने पख फैलाते उड़ती हुई छोटी सी चिड़िया की तस्वीर बनाई थी जिसमें मुंह की जगह खुद को चित्रित किया था,वह सोचती थी कि मैं चल नहीं सकतीं,,jदौड नहीं सकती तो क्या हुआ,,उड तो सकती हूं,, चिड़िया की तरह,,,एक दिन मैं जरुर उडूगी,, और हर जगह पहुंच कर मां के सारे काम आसान कर दूंगी,,,’
शर्मा जी ने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित बाल चित्रकला में प्रिया की बनाई हुई वह तस्वीर भेज दी थी,, जिस पर पच्चीस हजार रु का पुरस्कार मिलने वाला था, और जब उसका परिणाम निकला आज के समाचार पत्र में,,तो शर्मा जी खुशी से उछल पड़े,,प्रिया की फोटो और उसकी बनाई वहीं तस्वीर मुखपृष्ठ की शोभा बढ़ा रहा था, राष्ट्रपति द्वारा उसे कला सीखने के लिए विशिष्ट छात्रवृत्ति भी मिली थी आगे की शिक्षा के लिए,,,आज उनकी आंखों में आसूं थे,यही तो वे चाहते थे,,,वे लगभग दौड़ते हुए प्रिया के पास पहुंचे और उसे गले से लगा लिया,,उनका सपना था यह कि प्रिया की प्रतिभा कही गरीबी के पैरों तले कुचलकर नष्ट न हो जाए,उन्होने प्रिया की मां से कहा””बहन,अब तुम्हारे दुखों के दिन नहीं रहे, तुम्हारी प्रिया अब बहुत बडी कलाकार बनेगी,ये देखो*वे भी खुशी के आंसुओं में डूब गयी ,प्रिया ने शर्मा जी के गले में प्यार से बाहें डाल दीं””थैक यू अंकल।
आज प्रिया विकलांग नहीं थी,वह उड सकती थी अपने सपनों के सहारे उड़ने के लिए उसे पख जो मिल गये थे,। उसके हौसलों ने उसके सपनों को मजबूती से आधार दे दिया था।
-पद्मा मिश्रा
