सफ़र में धूप के साए बदल जाना नहीं अच्छा,
थके हारे मुसाफ़िर का ठहर जाना नहीं अच्छा।
दिखावे की हँसी हँसकर ज़माने को दिखाते हैं,
मगर भीतर ही भीतर यूँ बिखर जाना नहीं अच्छा।
कहा जो सच तो सब ख़ामोश हैं इस अंजुमन में,
सच्चाई की डगर से अब मुकर जाना नहीं अच्छा।
हवाएँ मोड़ देती हैं चराग़ों का रुख़ अक्सर,
अंधेरे के डराने से सिहर जाना नहीं अच्छा।
जो रिश्ते सिर्फ़ मतलब की बिना पर सांस लेते हैं,
उन्हें ढोते हुए ता-उम्र मर जाना नहीं अच्छा।
-दिव्या सिंह सिसोदिया
