ग़ज़ल 122 122 122 12
सभी जानते हैं, नगीने मिले।
मगर यार मुझको, हठीले मिले।
मुहब्बत किया था मैं जिससे यहां,
खुशी और गम सब, उसीसे मिले।
मिटाकर जो मुद्दत से थी दुश्मनी,
बड़े प्यार से सब, भतीजे मिले।
जिसे प्रेम दुनिया समझती रही,
वो दौलत से सारे, खरीदे मिले।
तलाशा जहां में मैं सच को जहां,
वहीं झूठ के सब, बगीचे मिले।
सुनायीं गईं मेरी ग़ज़लें जहां,
बजाते हुए कुछ, मजीरे मिले।
मुहब्बत जिसे भी हुआ है यहां,
उसे जिंदगी के, तरीके मिले।
कली थी बनी फूल ये कब हुआ,
यही पूछते कुछ, मसीहे मिले।
गुनहगार जो था उसी के सभी,
न जाने क्यों पढ़ते, कसीदे मिले।
ज़माने में जो भी ‘अकेला’ हुआ,
ज़माने से जी भर, घसीटे मिले।
-संतोष सिंह ‘अकेला’
