समय का अभाव या प्राथमिकताओं का संकट?

   "शायद आज किसी को लिखने का समय नहीं मिला।"
   यह वाक्य सुनने में जितना सहज लगता है, उतना ही गहरा प्रश्न अपने भीतर समेटे हुए है। क्या सचमुच समय नहीं मिला, या फिर लिखना हमारी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया?
   हम सभी को प्रतिदिन चौबीस घंटे ही मिलते हैं। इन्हीं चौबीस घंटों में कोई नया कौशल सीख लेता है, कोई पुस्तक लिख देता है, कोई अपने स्वास्थ्य को संवारता है और कोई परिवार के साथ यादगार पल जी लेता है। यदि समय सबके लिए समान है, तो अंतर कहाँ है? अंतर केवल इस बात में है कि हम अपने समय को किस कार्य के लिए सुरक्षित रखते हैं।
    आज की व्यस्त जीवनशैली में हर व्यक्ति अपने दायित्वों से घिरा हुआ है। परिवार, व्यवसाय, नौकरी, सामाजिक उत्तरदायित्व और डिजिटल दुनिया के बीच समय का संतुलन कठिन अवश्य हो गया है, पर असंभव नहीं। सच तो यह है कि समय का सबसे बड़ा अभाव घड़ी में नहीं, हमारी प्राथमिकताओं में दिखाई देता है।
    जब कोई कार्य हमें महत्वपूर्ण लगता है, तब उसके लिए समय अपने आप निकल आता है। घंटों मोबाइल पर बिताना सहज लगता है, लेकिन कुछ मिनट पढ़ने, लिखने या आत्मविकास के लिए निकालना कठिन प्रतीत होता है। तब हम यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर लेते हैं कि समय ही नहीं मिला।
    वास्तव में समय कभी मिलता नहीं, उसे निकालना पड़ता है। जिस कार्य को हम महत्व देते हैं, उसके लिए परिस्थितियाँ भी बना लेते हैं। यदि लेखन हमारे जीवन का हिस्सा है, तो प्रतिदिन कुछ पंक्तियाँ लिखना भी एक सार्थक शुरुआत हो सकती है। छोटी छोटी नियमित कोशिशें ही बड़े सृजन का आधार बनती हैं।
    जीवन में अधूरे रह जाने वाले अधिकांश सपनों के पीछे समय का अभाव नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का असंतुलन होता है। यदि हम स्वयं से ईमानदारी से प्रश्न करें कि आज का सबसे अधिक समय कहाँ व्यतीत हुआ, तो उत्तर भी मिल जाएगा और समाधान भी।
   इसलिए अगली बार जब मन कहे कि समय नहीं मिला, तब एक बार स्वयं से अवश्य पूछें कि क्या वास्तव में समय का अभाव था, या मैंने अपने समय को किसी और प्राथमिकता के नाम कर दिया?
 समय सभी के पास समान है, लेकिन उपलब्धियाँ समान नहीं होतीं। यही अंतर हमारी प्राथमिकताओं से तय होता है। समय को दोष देने से बेहतर है कि हम अपनी प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करें, क्योंकि बदली हुई प्राथमिकताएँ ही बदला हुआ भविष्य लिखती हैं।

-डॉ. प्रीति समकित सुराना

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