पत्तियां सूख जाएंगी,
धीरे धीरे झर जाएंगी शाखाओं से।
फिर आएंगी नई कोपलें।
धुंधले हो जाएंगे शब्द,
मिट जाएंगी किताबें।
गुम जाएंगी पहचाने,
मिट जायेंगे निशान।
जमींदोज होगी इमारतें,
जहां है आज चहलपहल।
भर जाएगी हमारी जगह,
जैसे बूंदें भर देती है सूखी जमीन।
समय की धुंध में खो जाएगा नाम,
बस रह जाएगी यादें
वो भी तनिक समय।
फिर बनेगी नई पीढ़ी
और दोहराएगी अपना इतिहास।
-अबरार खान
सागर मध्य प्रदेश
