“समय नहीं मिला – ये व्यस्त लोग”

समय नहीं मिला
अब बहाना नहीं
नये युग का स्टेट्स सिम्बल है
जेब में रखा हुआ
एक चमकता हुआ बहाना
जिसे हम दिखाते हैं
ताकि दुनिया समझे
हम बहुत काम वाले लोग हैं

कल तक नुक्कड़ की बेंच पर
देश और दुनिया का
हिसाब बराबर करने वाले
आज कहते हैं
बहुत टाइट शेड्यूल है
और उस शेड्यूल में
नींद की उधारी है
और
नोटिफिकेशन की आरती

सुबह उठते ही
ये लोग सूरज को नहीं देखते
फोन की स्क्रीन में झांकते हैं
रात की बची हुई दुनिया
सुबह में निपटाते हैं
स्क्रीन को
घुमा घुमा कर देखते हैं
मानों उनके सोने के बाद जागने तक
ये दुनिया सिमट तो नहीं गई होगी

घर में माँ पुकारती है
दो मिनट बैठ जा
बेटा कहता है
अभी नहीं
बहुत काम है
और वही बेटा
पांच मिनट बाद
एक वीडियो में
दूसरों की जिंदगी का मजमा देखता है

पत्नी धीरे से पूछती है
आज थोड़ा समय मिलेगा क्या
साथ बैठेंगे
यूं ही बात करेंगे

पति मुस्कुरा कर कहता है
अभी बहुत प्रेशर है
ऑफिस के काम पेंडिंग हैं
वीकेंड पर देखते हैं

और वही वीकेंड
स्क्रीन के हवाले हो जाता है
जहां पति
दुनिया भर की खबरों में व्यस्त रहता है
और पत्नी
अपने ही घर में
इंतजार की चुप्पी बुनती रहती है

पिता कहते हैं
चलो बैंक चलते हैं
जवाब आता है
आज नहीं
मीटिंग है
डेडलाइन है
और फिर वही योद्धा
दो घंटे तक
अजनबियों की छुट्टियों
शादियों
और मुस्कानों पर
अपना समय निवेश करता है

बच्चा दौड़कर आता है
पापा खेलोगे मेरे साथ
आज तो खेल लो पापा
या फिर
एक कहानी सुनाओगे

जवाब आता है
अभी नहीं बेटा
बहुत काम है
तुम मम्मी के पास जाओ

बच्चा चुप हो जाता है
अपने खिलौनों से बात करता है
और धीरे धीरे सीख जाता है
समय नहीं मिला

थोड़ा बड़ा होकर
वही बच्चा कहता है
पापा अभी गेम चल रहा है
बाद में बात करते हैं

ये व्यस्त लोग
किराना नहीं ला पाते
पर ऐप्स में खो जाते हैं
दस रुपये बचाने के लिए
घंटों कीमतें तौलते हैं
और फिर कहते हैं
आज बहुत भागदौड़ रही

इनके पास अपनों के लिए
समय का सिक्का नहीं बचता
पर स्क्रीन के बाज़ार में
ये खुलकर खर्च करते हैं

ऑफिस में ये लोग
मीटिंग पर मीटिंग रखते
प्रेजेंटेशन ज्यादा होता है
काम वही रहता है
पर थकान बढ़ जाती है

लैपटॉप खुला रहता है
आँखें कहीं और भटकती हैं
काम का नाटक चलता है
और समय चुपचाप खिसकता है

दोस्तों के ग्रुप में
अब सन्नाटा बसता है
कभी मिलते हैं
फिर मिलने का
एक ऐसा वादा
जिसकी कोई तारीख नहीं होती

पर जैसे ही बहस छिड़ती है
राजनीति पर
क्रिकेट पर
या किसी वायरल खबर पर
यही लोग
शब्दों की आंधी बना देते हैं
और साबित करते हैं
कि समय की कमी नहीं
इस्तेमाल की कमी है

रिश्ते भी अब
रीचार्ज प्लान जैसे हो गए हैं
जब जरूरत हो
तभी एक्टिव
बाकी समय
इनबॉक्स में पड़े रहते हैं

ये लोग
जन्मदिन भूल जाते हैं
पर ट्रेंडिंग हैशटैग याद रखते हैं
घर की बातें छूट जाती हैं
पर दुनिया की खबरें पकड़ लेते हैं

वीकेंड आता है
तो ये लोग
स्क्रीन के समंदर में उतर जाते हैं
एक एपिसोड
फिर एक और
फिर एक और
और देखते देखते
पूरा दिन गुजर जाता है

सुबह देर से होती है
दोपहर थकी हुई आती है
शाम बिना बात के ढलती है
और रात कहती है
आज भी कुछ खास नहीं हुआ
कल देखते हैं

ये लोग वॉक पर जाते हैं
पर रास्तों से नहीं मिलते
हाथ में मोबाइल
निगाहें स्क्रीन पर
स्टेप्स गिनते हैं
सफर भूल जाते हैं

जिम में पसीना बहाते हैं
पर मन की जड़ता नहीं पिघलती
सेल्फी लेते हैं
स्टेटस में डालते हैं
और खुद से दूर होते जाते हैं

ये बच्चे से कहते हैं
मोबाइल छोड़ो
बेटा पढ़ाई करो
पर खुद स्क्रीन से चिपके रहते हैं
और बच्चा सीख जाता है
समय नहीं मिला

ये लोग
किताब खरीदते हैं
पर पढ़ नहीं पाते
सोचते हैं
कभी फुर्सत मिलेगी
और वो कभी
मिलती ही नहीं

समय तो फिर भी
वहीं खड़ा रहता है
सीधा सरल
अपनी चाल में मग्न
न तेज
न धीमा

हमने घड़ी पहन ली
अलार्म लगा लिए
रिमाइंडर सेट कर लिए
पर जीने का सलीका
कहीं सेव नहीं किया

और अंत में
इतिहास एक नोट लिखता है
इन लोगों के पास
सब कुछ था
बस समय नहीं था…
और जो समय था
वो कभी उनके पास नहीं
इतिहास ज्यादा नहीं लिखेगा
बस इतना कहेगा:

ये लोग बहुत व्यस्त थे
इतने व्यस्त
कि जीना भूल गए

-सीए (डॉ.) गौतम कोठारी डी.लिट.’शफ़क़’

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