त्रिशा जब घर में घुसी तो लड़के वाले आ चुके थे।रसोई घर में चाय की व्यवस्था करते हुए उसकी मम्मी के चेहरे पर तनाव व्याप्त था।
जा बेटा, जल्दी से तैयार हो जा, वो लोग आ चुके हैं।
त्रिशा मुस्कराते हुए तैयार होने चल दी। आज फिर एक परीक्षा देनी होगी।अपने चेहरे पर आत्मविश्वास और विवेक का दिपदिपाता सौंदर्य लिए उसने ड्राइंग रूम में प्रवेश किया, सामने सोफे पर बैठी एक गरिमामय व्यक्तित्व की सौम्य महिला ने उसका स्वागत किया। आओ बेटी, यहां बैठो। त्रिशा ने झुककर उनके चरण स्पर्श किये और साथ में बैठे हुए राजेश और उनके पिता को भी अभिवादन कर वहीं बैठ गई। मां भी चाय लेकर आ गई थीं। त्रिशा के माता-पिता का मन कुछ सशंकित था, लेकिन लड़के वाले बिल्कुल सहज, शांत थे, लडके के पिता ने प्रश्न किया- मेरा बेटा एक जिम्मेदार पद पर है, परिवार में समृद्धि है ईश्वर की कृपा से,.. परंतु हमें बेटे के लिए जीवन संगिनी के साथ-साथ एक विवेकशील, समझदार बहू भी चाहिए। क्या तुम दोनों भूमिकाएँ निभा पाओगी?
त्रिशा ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया,”जी विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच ही नही बल्कि परिवार और बडों के आशीष के साथ भी होता है, मैं पूरी कोशिश करुँगी।
त्रिशा के इस समझदार कथन से कमरे का माहौल बदला। राजेश के पिता ने चाय पीते हुए प्रश्न किया-
बेटी, तुम योग्य और होनहार हो फिर तुम नौकरी आगे भी करना चाहोगी?
कमरे में सन्नाटा छा गया था, यही तो वह यक्ष प्रश्न था जिसने त्रिशा और उसके परिवार को बार-बार व्यथित किया था। पहले जो रिश्ते आये, उन्हें बहू का नौकरी करना पसंद नहीं था और बात यहीं अटक जाती थी। यह उलझन कभी सुलझ ही नहीं पाती थी।
तभी त्रिशा का कोमल, गंभीर स्वर गूंजा’ जी अंकल मुझे विश्वास है कि मै अपनी शिक्षा का सम्मान करते हुए, आपके आशिर्वाद और मार्गदर्शन से अपने परिवार को साथ लेकर चलूंगी और अपने सारे कर्तव्य निभाऊंगीं।
त्रिशा के जवाब से सभी खुश हो गये। तभी राजेश के पिता ने कहा, मुझे विश्वास है कि तुम अपनी मेहनत और लगन से जिस तरह आगे बढ़ी हो तुम्हारे संस्कार, मेरा परिवार भी संवार देंगें, आशीर्वाद देता हूं।
तभी राजेश ने एक मिठाई उठाकर खाते हुए कहा- जीवन के इस नये सफर में तुम अकेली नहीं मैं भी साथ रहूंगा। सारा परिवार खुश था। एक लंबी कठिन चुनौती भरी उलझन का समाधान जो हो गया था।
पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर
