मानव मन है, मानव तन है,
मानवता ही मानव जीवन है।
“जियो और जीने दो” की संस्कृति में,
रचा-बसा यह सारा जीवन है॥
बाल्यकाल से लेकर सम्पूर्ण जवानी,
संघर्षों की कटु गाथा है।
वृद्धकाय यह तन हो गया निर्जन,
न कोई भोग-लालसा, न कोई अभिलाषा है॥
बस इतनी-सी है अभिलाषा,
अपनत्व का अपनापन बना रहे।
समय-समय पर सुधि लेते रहें सब,
यह स्नेह-सना बेचारापन बना रहे॥
गए लोग फिर लौट न सकेंगे,
लौटेगा न बीता हुआ वक्त।
समा जाएँ कब वक्त के गाल में,
किसको है इसका सही आभास युक्त॥
साँसें सदा तन में ठहरती नहीं,
जीवन रहता नहीं कभी स्थिर।
इसलिए प्रेम और अपनापन बाँटो,
यही मनुष्य होने का है सार अमर॥
-नील मणि पाण्डेय

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👌
शानदार रचना।