(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
घमंड मत करना,टूट जायेगा खिलोना।
नहीं भरोसा कल का,सांसें देती है दगा।
जब जनाजा उठेगा,घमंड भी टूटा होगा।
कफ़न ओढ़े जायेगा,सांसें देती है दगा।
सभी को जोड़े रखना,पाकिजा बने रहना।
चंद दिनों की जिंदगी,सांसें देती है दगा।
श्रेष्ठ रखेगी गरिमा,बदल रहा है समां।
वही रहे जेहन में,सांसें देती है दगा।
दुवाएं लेके चलना,दीप बनके जलना।
भरें उजाला जहां में,सांसें देती है दगा।
यादगार बने नेकी,कर्म ही रहेंगे बाक़ी।
तस्वीरों पे चढ़े माला,सांसें देती है दगा।
सिर्फ रहेगी वो यादें,मिट जाते है परिंदें।
छूट जाता है घोंसला,सांसें देती है दगा।
घमंड मत करना,मिट्टी का बना खिलोना।
बन जायेगा वो मिट्टी,सांसें देती है दगा….
-प्रा.गायकवाड विलास
मिलिंद महाविद्यालय लातूर (महाराष्ट्र)
