सावन की घटा छाई
हरित हरियाली छाई
जैसे दुल्हन नभ के वेश में
जैसे काले बादल
धुधराले केश में।
धरती दुल्हन सजी
मानो डोला चली
सावन की बहार
रिमझिम फुहार,
चिड़ियों की चहक
फूलों की महक
मंद मंद मुस्कान भरे
बाग में झूमें तितलियाँ।
रागिनी सी दम के
दामिनी सी चमके
चपला चपक चंचल
चुंबक सी बिजलियाँ
मानो तीर चलाती
गिरी हो बिजलियाँ
काली काली घटाएँ
फन को फैलाफैलाए
चमके बिजुरियां।
इंद़ धनुष सप्त रंग
चमके दम के बादल में
रागिनी के सात स्वर
गाते मल्हार सावन में
कान्हा की बंशी पुकारे
यमुना की छांव में
गौरी के नूर बोले
नटखट पांव में।
कोयल कूहके डारी डाली
आज भ ई है मतवाली
चकवा और चकोर
पीहू बोले चहुओर
नदियों की उफान
जैसे अल्हड़ सी चाल में।
ऋतु सुनी सावन बिना
बंशी सूनी कान्हां बिना
बरखा सूने बादल बिना
पत्ते सूने फूल बिना
साजन अब तो आन मिलों
ना तरसाओ तन मन को।
ऊषा नौगरहिया
कटनी
