साहित्यिक सफर

माँ वाग्देवी की असीम कृपा से ही सकारात्मक साहित्यिक सफर प्रारंभ हुआ। शिक्षा-शिक्षक-शिक्षार्थी बन बनारस शहर से ये सफर शुरु हुआ और बाबा विश्वनाथ की महिमा से आज तक निरन्तर प्रगतिशील है।महादेवी वर्मा,
डॉ•हजारी प्रसाद द्विवेदी, पुपुल जयकर के सानिध्य से प्रेरित होकर लिखना, काव्य पाठ करना, मंच संचालन, के माध्यम से समाज हित के साथ दशा और दिशा बदलने की जिद्द ने लेखनी को धार दी।
सृजन सदैव खूबसूरत होता है।
बीज पुष्पित पल्लवित होकर सुन्दर फूल देता है।उसी तरह साहित्यकार अपनी रचना से समाज को दिशा प्रदान करता है।कहने का तात्पर्य साहित्य समाज का दर्पण है।हर व्यक्ति में एक विशेष गुण होता है।बस समय और विश्वास से दृढ़संकल्पित होकर अपने गन्तव्य तक पहुंच जाना ही जहाँ चाह वहाँ राह बन जाती है।हमारी अभिरुचि दृढ़संकल्प के साथ अभ्यास कराती है और हमारा मार्ग प्रशस्त होते ही हमारी मंजिल मिल जाती है। अनन्त कलायें कलाकार को जन्म देती है यदि हम कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उस के हाव भाव को देखते ही हम कह देते हैं पूत के पाँव पालने में नज़र आते हैं मतलब बचपन से ही हर शख्स कलाकार होता है। पारखी नज़र पहचान लेता है कुछ अनदेखा कर अपना विचार थोप उसे गुमराह कर देता है।
एक मोची सनी इंडियन आइडल का हीरो बना न कोई गुरु न तालिम पर जिज्ञासा प्रबल इच्छा,दृढ़संकल्प प्रवृत्ति गरीबी को भी मात दे दी। ये साहित्य का जीवन पर प्रभाव है।हमारे देश-काल, परिस्थिति के अनुसार साहित्य समाज को सच्चाई की राह पर चलना सीखाता है। किसी भी व्यक्ति का विकास साहित्यिक गतिविधियों पर निर्भर है।जैसा साहित्य होगा वैसा ही हमारा विकास होगा,इसीलिए कहा गया है कि अच्छा साहित्य ही आत्मसात करनी चाहिए।साहित्य ही हमारी संस्कृति और संस्कार को समाज से जोड़ती है ,जिसका अमिट प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व पर परिलक्षित होता है।सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों कानिष्पक्ष मूल्यांकन उस देश के साहित्य से ही पता चलता है।अंत में हम कह सकते हैं कि साहित्य का हमारे जीवन के साथ अन्योनाश्रित संबंध है।

-प्रेम सिंह काव्या
छत्तीसगढ़

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