अग्निबाण से
बेध रहे हो
तुम नाजुक फूलों को
सहमी सहमी नदी
सिमट कर
छोड़ रही कूलों को
उलटी पड़ी नाव
भूल कर
लहरों वाले राग
हुई धराशायी
वह हिरणी
कबसे भाग रही थी
नीर भरे थे नयन
विकल हो
छाया माँग रही थी
अंधा हुआ
स्वार्थ में मानव
काट रहा बन बाग
-डॉ. मधु प्रधान
कानपुर (उत्तरप्रदेश )
