रोज हत्याएँ, फिर भी सब मौन हैं।
बेवजह हत्याएँ करे कौन है।01।
आदमी भी हैवान हुआ चल रहा।
डर जगाकर खुशियाँ लुटा चल रहा।02।
लोग अपनों से दूर हो चल रहे।
खूबसूरत रिश्ता खोते दिख रहे।03।
आज सरकारें फेल हो चल रहीं।
जिन्दगी मानो झेल हो चल रही।04।
लोग भी आखिर चाहते क्या यहाँ।
दुश्मनों से मिल मांगते क्या यहाँ।05।
जिन्दगी यह भगवान् के हाथ में।
घोर कलियुग है, जी रहे आज में।06।
-अजय पाण्डेय बेबस
